भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यहाँ हर राज्य की अपनी भाषा, पहनावा, संगीत और नृत्य शैली है। इन्हीं सांस्कृतिक धरोहरों में भरतनाट्यम का नाम सबसे सम्मानित शास्त्रीय नृत्यों में लिया जाता है।
आज जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय संस्कृति का प्रदर्शन होता है, तो भरतनाट्यम अक्सर उसकी पहली पहचान बनता है। इसकी सुंदर मुद्राएँ, सटीक ताल, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और पारंपरिक वेशभूषा हर दर्शक को भारतीय सभ्यता की गहराई का अनुभव कराती हैं।भरतनाट्यम: भारत की प्राचीन शास्त्रीय नृत्य कला का परिचय
भरतनाट्यम दक्षिण भारत के तमिलनाडु की एक प्राचीन शास्त्रीय नृत्य शैली है। यह नृत्य केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि भाव, संगीत, अभिनय और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का अद्भुत मेल है।
इस नृत्य में कलाकार बिना अधिक शब्दों के अपने चेहरे के भाव, हाथों की मुद्राओं और शरीर की गतियों से पूरी कहानी प्रस्तुत करता है। यही विशेषता इसे अन्य नृत्य शैलियों से अलग बनाती है।
भरतनाट्यम नाम का अर्थ और इसकी उत्पत्ति
भरतनाट्यम शब्द को लेकर कई मत हैं, लेकिन सबसे लोकप्रिय व्याख्या यह है—
भा – भाव
र – राग
त – ताल
नाट्यम – अभिनय सहित नृत्य
अर्थात जहाँ भाव, संगीत, लय और अभिनय एक साथ मिलते हैं, वही भरतनाट्यम है।
भरतनाट्यम की उत्पत्ति कैसे हुई?
भरतनाट्यम की शुरुआत आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले दक्षिण भारत के मंदिरों में हुई मानी जाती है।
उस समय मंदिर केवल पूजा करने का स्थान नहीं होते थे। वे शिक्षा, संगीत, साहित्य और कला के बड़े केंद्र भी थे। मंदिरों में विशेष अवसरों पर देवताओं की आराधना के लिए नृत्य प्रस्तुत किए जाते थे। इन्हीं धार्मिक प्रस्तुतियों ने आगे चलकर भरतनाट्यम का रूप लिया।
प्राचीन समय में इसे सदिर या दासी अट्टम के नाम से जाना जाता था।
नाट्यशास्त्र का भरतनाट्यम के विकास में योगदान
यदि भरतनाट्यम की नींव की बात करें, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण आधार नाट्यशास्त्र है।
ऋषि भरतमुनि द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय नृत्य और रंगमंच का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें नृत्य की मुद्राओं, भावों, ताल, संगीत और अभिनय से जुड़े विस्तृत नियम बताए गए हैं।
आज भी भरतनाट्यम सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए नाट्यशास्त्र प्रेरणा का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
देवदासी परंपरा का भरतनाट्यम से क्या संबंध था?
भरतनाट्यम के इतिहास में देवदासी परंपरा का विशेष स्थान रहा है।
देवदासियाँ वे महिलाएँ थीं जो मंदिरों में धार्मिक सेवाओं के साथ नृत्य और संगीत प्रस्तुत करती थीं। उनका उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि भगवान के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करना था।
उनके द्वारा प्रस्तुत नृत्य में धार्मिक कथाएँ, नैतिक संदेश और आध्यात्मिक भावनाएँ प्रमुख होती थीं।
भरतनाट्यम के संरक्षण में दक्षिण भारत के राजाओं का योगदान
यदि दक्षिण भारत के राजाओं ने इस कला को संरक्षण न दिया होता, तो शायद भरतनाट्यम आज इस रूप में हमारे सामने नहीं होता।
विशेष रूप से—
- पल्लव वंश
- चोल वंश
- पांड्य वंश
- विजयनगर साम्राज्य
इसी काल में भरतनाट्यम की तकनीक और प्रस्तुति अधिक विकसित हुई।
ब्रिटिश शासन के दौरान भरतनाट्यम का पतन
भरतनाट्यम के इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब इस कला का अस्तित्व संकट में पड़ गया।
ब्रिटिश शासन के दौरान देवदासी प्रथा पर प्रतिबंध लगाए जाने लगे। इसके साथ ही मंदिरों में होने वाले नृत्य कार्यक्रम भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगे।
कई लोगों ने इस नृत्य को सामाजिक दृष्टि से गलत समझना शुरू कर दिया, जिससे इसकी लोकप्रियता कम होने लगी।
भरतनाट्यम का पुनर्जागरण और आधुनिक पुनरुत्थान
20वीं शताब्दी भरतनाट्यम के लिए नई शुरुआत लेकर आई।
कुछ कलाकारों और समाज सुधारकों ने महसूस किया कि यदि समय रहते इस कला को नहीं बचाया गया, तो भारत अपनी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत खो देगा।
इसी दौरान रुक्मिणी देवी अरुंडेलने भरतनाट्यम को नई पहचान दी। उन्होंने इसे आधुनिक मंचों तक पहुँचाया और इसे सम्मानजनक स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके अलावा बालासरस्वती और ई. कृष्ण अय्यर ने भी इस कला को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भरतनाट्यम की प्रमुख विशेषताएँ और इसकी अनूठी पहचान
भरतनाट्यम को देखते ही उसकी कुछ विशेष बातें तुरंत ध्यान आकर्षित करती हैं।
भावों की अभिव्यक्ति
इस नृत्य में आँखों, चेहरे और शरीर की हल्की-हल्की गतियों से गहरे भाव व्यक्त किए जाते हैं।
हस्त मुद्राएँ
प्रत्येक हाथ की मुद्रा का अपना अर्थ होता है। इन्हीं मुद्राओं के माध्यम से कहानी प्रस्तुत की जाती है।
ताल, लय और अनुशासन का अद्भुत समन्वय
भरतनाट्यम में हर कदम संगीत की लय के अनुसार होता है। इसमें अनुशासन का विशेष महत्व है।
कर्नाटक संगीत
इसकी अधिकांश प्रस्तुतियाँ दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत पर आधारित होती हैं।
पारंपरिक वेशभूषा
विशेष प्रकार की रेशमी पोशाक, मंदिर शैली के आभूषण और पैरों में बंधे घुँघरू इसकी अलग पहचान हैं।
आधुनिक समय में भरतनाट्यम का महत्व और वैश्विक पहचान
अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, सिंगापुर और कई यूरोपीय देशों में इसकी नियमित शिक्षा दी जाती है।
भारतीय समुदाय के साथ-साथ विदेशी विद्यार्थी भी इस कला को सीख रहे हैं। कई अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भरतनाट्यम भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।
भरतनाट्यम सीखने के फायदे और जीवन में इसका महत्व
भरतनाट्यम केवल मंच पर प्रदर्शन करने की कला नहीं है। इसे सीखने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में भी सकारात्मक बदलाव आते हैं।
- शरीर का संतुलन बेहतर होता है।
- आत्मविश्वास बढ़ता है।
- अनुशासन की आदत विकसित होती है।
- स्मरण शक्ति और एकाग्रता में सुधार होता है।
- भारतीय संस्कृति को समझने का
भारतीय संस्कृति और सभ्यता में भरतनाट्यम का महत्व
भरतनाट्यम भारत की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
यह नृत्य हमें यह याद दिलाता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का भी माध्यम है।
आज जब दुनिया भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है, तब भरतनाट्यम हमारी सांस्कृतिक विरासत का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बनकर सामने आता है।
भरतनाट्यम का इतिहास केवल एक नृत्य शैली का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, भक्ति, अनुशासन और सांस्कृतिक विकास की कहानी है। मंदिरों से शुरू होकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची यह कला इस बात का प्रमाण है कि यदि किसी परंपरा में गुणवत्ता और आत्मा हो, तो समय भी उसे मिटा नहीं सकता।


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