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पुर्तगालियों का भारत आगमन: वास्को-दा-गामा से गोवा तक का सम्पूर्ण इतिहास

 

पुर्तगालियों का भारत आगमन: वास्को-दा-गामा से गोवा तक का सम्पूर्ण इतिहास 

भारत का इतिहास अनेक महान सभ्यताओं, राजवंशों और विदेशी शक्तियों के आगमन का साक्षी रहा है। इन्हीं घटनाओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी पुर्तगालियों का भारत आगमन। यह केवल एक विदेशी व्यापारी दल का भारत पहुँचना नहीं था, बल्कि इसने भारतीय व्यापार, राजनीति, संस्कृति और भविष्य की दिशा को पूरी तरह बदल दिया।

आज जब हम भारत में यूरोपीय उपनिवेशवाद की शुरुआत की बात करते हैं, तो सबसे पहले पुर्तगालियों का नाम सामने आता है। 1498 ईस्वी में वास्को-दा-गामा का कालीकट पहुँचना विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री खोजों में से एक माना जाता है। इसी घटना ने यूरोप और भारत के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित किया तथा आगे चलकर डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी शक्तियों के भारत आने का मार्ग भी प्रशस्त किया। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि पुर्तगालियों ने भारत का समुद्री मार्ग कैसे खोजा, वे भारत क्यों आए, भारत में उनका शासन कैसे स्थापित हुआ, उनकी प्रमुख नीतियाँ क्या थीं, भारतीय समाज पर उनका क्या प्रभाव पड़ा और अंततः उनका पतन किन कारणों से हुआ। 15वीं शताब्दी में भारत का महत्व: क्यों था भारत विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र? 15वीं शताब्दी का भारत विश्व के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता था। भारत केवल कृषि और हस्तशिल्प के लिए ही प्रसिद्ध नहीं था, बल्कि मसालों, सूती वस्त्रों, रेशम, नील, बहुमूल्य पत्थरों और धातुओं का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र भी था। उस समय यूरोप के लोग भारतीय मसालों के बिना अपने भोजन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, इलायची और जायफल जैसे मसालों की कीमत यूरोप में बहुत अधिक थी। इन्हें "काला सोना" तक कहा जाता था। लेकिन भारत और यूरोप के बीच सीधा समुद्री संपर्क नहीं था। व्यापार मुख्यतः अरब और वेनिस के व्यापारियों के माध्यम से होता था। इस कारण वस्तुओं की कीमत कई गुना बढ़ जाती थी। यही कारण था कि यूरोप के देशों ने भारत तक पहुँचने के नए समुद्री मार्ग की खोज शुरू की।
पुर्तगालियों के भारत आने के प्रमुख कारण: व्यापार, मसालों और समुद्री मार्ग की खोज भारत आने के पीछे पुर्तगालियों के कई महत्वपूर्ण उद्देश्य थे। केवल व्यापार ही उनका लक्ष्य नहीं था, बल्कि वे एशिया में अपना राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव भी स्थापित करना चाहते थे। 1. मसालों का लाभदायक व्यापार यूरोप में भारतीय मसालों की अत्यधिक मांग थी। यदि पुर्तगाल सीधे भारत से मसाले खरीदता, तो उसे अरब व्यापारियों को भुगतान नहीं करना पड़ता और उसे कई गुना अधिक लाभ मिलता। 2. नए समुद्री मार्ग की खोज 1453 ईस्वी में कॉन्स्टेंटिनोपल पर उस्मानी तुर्कों का अधिकार हो गया। इसके बाद पारंपरिक व्यापारिक मार्गों पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। इससे यूरोपीय व्यापारियों के लिए भारत तक पहुँचना कठिन और महँगा हो गया। इसलिए पुर्तगाल ने समुद्र के रास्ते भारत पहुँचने का निर्णय लिया।
3. अरब व्यापारियों के प्रभुत्व को समाप्त करना उस समय हिंद महासागर के अधिकांश व्यापार पर अरब व्यापारियों का नियंत्रण था। 4. ईसाई धर्म का प्रचार पुर्तगाली शासक स्वयं को ईसाई धर्म का संरक्षक मानते थे। उनका उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं था बल्कि जहाँ भी वे जाते थे, वहाँ ईसाई धर्म का प्रचार भी करते थे। बाद में गोवा सहित कई क्षेत्रों में उन्होंने चर्चों का निर्माण कराया। 5. राजनीतिक शक्ति स्थापित करना पुर्तगाल समझ चुका था कि केवल व्यापारिक केंद्र बनाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि व्यापार को सुरक्षित रखना है तो सैन्य शक्ति और राजनीतिक नियंत्रण भी आवश्यक होगा। इसी सोच ने आगे चलकर भारत में पुर्तगाली शासन की नींव रखी। भारत के समुद्री मार्ग की खोज: वास्को-दा-गामा ने कैसे खोजा भारत का नया रास्ता?

भारत पहुँचने का समुद्री मार्ग खोजने का श्रेय पुर्तगाल को जाता है। इस कार्य की शुरुआत पुर्तगाल के राजकुमार प्रिंस हेनरी द नेविगेटर ने की। उन्होंने अफ्रीका के पश्चिमी तट की खोज के लिए अनेक समुद्री अभियानों को प्रोत्साहित किया। इसके बाद बार्थोलोम्यू डायस ने 1488 ईस्वी में अफ्रीका के दक्षिणी छोर तक पहुँचकर केप ऑफ गुड होप (आशा अंतरीप) की खोज की। यही खोज आगे चलकर वास्को-दा-गामा की सफलता का आधार बनी। वास्को-दा-गामा का जीवन परिचय: भारत तक समुद्री मार्ग खोजने वाले महान पुर्तगाली नाविक की कहानी वास्को-दा-गामा पुर्तगाल का प्रसिद्ध नाविक और खोजकर्ता था। उसे पुर्तगाल के राजा मैनुएल प्रथम ने भारत का समुद्री मार्ग खोजने की जिम्मेदारी सौंपी। वास्को-दा-गामा साहसी, कुशल और अनुभवी नाविक था। उसे लंबी समुद्री यात्राओं का अच्छा अनुभव था।
वास्को-दा-गामा की ऐतिहासिक यात्रा: भारत तक समुद्री मार्ग खोजने का अद्भुत सफर 8 जुलाई 1497 को वास्को-दा-गामा चार जहाजों और लगभग 170 नाविकों के साथ पुर्तगाल के लिस्बन बंदरगाह से रवाना हुआ। यात्रा अत्यंत कठिन थी। महीनों तक समुद्र में रहने के कारण भोजन और पानी की कमी हो जाती थी। कई नाविक बीमार पड़ गए, फिर भी वास्को-दा-गामा ने यात्रा जारी रखी। उसने अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप को पार किया और पूर्वी अफ्रीका के तट पर स्थित कई बंदरगाहों से होकर आगे बढ़ा। पूर्वी अफ्रीका के मालिंदी बंदरगाह पर उसे एक कुशल नाविक मिला, जिसने मानसूनी हवाओं की सहायता से हिंद महासागर पार करने में मदद की। कई महीनों की कठिन यात्रा के बाद अंततः 20 मई 1498 ईस्वी को वास्को-दा-गामा भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट (वर्तमान कोझिकोड, केरल) पहुँच गया। कालीकट में वास्को-दा-गामा का आगमन: भारत में पुर्तगालियों की ऐतिहासिक शुरुआत

जब वास्को-दा-गामा कालीकट पहुँचा, उस समय वहाँ जमोरिन नामक शासक का शासन था। जमोरिन ने विदेशी व्यापारियों का स्वागत किया और वास्को-दा-गामा को व्यापार करने की अनुमति दी। हालाँकि, कालीकट में पहले से सक्रिय अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों का कड़ा विरोध किया क्योंकि उन्हें अपने व्यापार पर खतरा महसूस होने लगा था। यहीं से हिंद महासागर में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की शुरुआत हुई

भारत में पुर्तगालियों की व्यापारिक गतिविधियाँ: समुद्री व्यापार और विस्तार का इतिहास कालीकट पहुँचने के बाद पुर्तगालियों ने केवल मसालों का व्यापार ही नहीं किया, बल्कि धीरे-धीरे भारत के पश्चिमी तट पर अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। उन्होंने यह समझ लिया था कि यदि व्यापार को सुरक्षित और लाभदायक बनाना है, तो समुद्री मार्गों और प्रमुख बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक होगा। शुरुआत में पुर्तगालियों ने कालीकट, कोचीन और कन्नूर जैसे बंदरगाहों पर व्यापारिक केंद्र (फैक्ट्रियाँ) स्थापित किए। इन केंद्रों से वे काली मिर्च, दालचीनी, इलायची, लौंग, अदरक, सूती वस्त्र और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का निर्यात यूरोप भेजने लगे। धीरे-धीरे उनका उद्देश्य केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने समुद्र में अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई और भारतीय महासागर के व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया। इस प्रकार पुर्तगाली व्यापारी एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति में बदलने लगे। भारत में पुर्तगालियों का प्रशासन: शासन व्यवस्था और औपनिवेशिक नीतियों का इतिहास भारत में व्यापारिक गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए पुर्तगाल के राजा ने प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। भारत में नियुक्त सर्वोच्च अधिकारी को वायसराय कहा जाता था। वायसराय सीधे पुर्तगाल के राजा के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता था और उसे सैन्य, प्रशासनिक तथा व्यापारिक अधिकार प्राप्त थे। भारत में नियुक्त प्रमुख पुर्तगाली अधिकारियों में फ्रांसिस्को डी अल्मीडा और अल्फोंसो डी अल्बुकर्क का नाम सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इन दोनों ने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की नींव मजबूत की। फ्रांसिस्को डी अल्मीडा – भारत का पहला पुर्तगाली वायसराय 1505 ईस्वी में फ्रांसिस्को डी अल्मीडा को भारत का पहला पुर्तगाली वायसराय नियुक्त किया गया। उसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर में पुर्तगाल की समुद्री शक्ति को मजबूत बनाना था। अल्मीडा का मानना था कि यदि समुद्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाए, तो व्यापार अपने आप सुरक्षित हो जाएगा। इसी विचार के आधार पर उसने प्रसिद्ध ब्लू वाटर पॉलिसी अपनाई। ब्लू वाटर पॉलिसी ब्लू वाटर पॉलिसी का अर्थ था "समुद्र पर अधिकार स्थापित करना"। इस नीति के अंतर्गत पुर्तगालियों ने
  • हिंद महासागर में शक्तिशाली नौसेना विकसित की।
  • समुद्री व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित किया।
  • विदेशी जहाजों की निगरानी शुरू की।
  • समुद्री डकैती और प्रतिद्वंद्वी व्यापारियों पर कठोर कार्रवाई की।
  • व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
इस नीति के कारण कुछ ही वर्षों में पुर्तगाल हिंद महासागर की सबसे शक्तिशाली समुद्री शक्ति बन गया। अल्फोंसो डी अल्बुकर्क: भारत में पुर्तगाली साम्राज्य के वास्तविक निर्माता का इतिहास
यदि भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक किसी को माना जाता है, तो वह अल्फोंसो डी अल्बुकर्क था। उसे 1509 ईस्वी में भारत का गवर्नर बनाया गया। उसने केवल व्यापार पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि स्थायी साम्राज्य स्थापित करने की योजना बनाई। अल्बुकर्क ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए, जिनके कारण भारत में पुर्तगालियों की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गई। गोवा पर पुर्तगालियों का अधिकार (1510 ई.): भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की मजबूत नींव अल्बुकर्क की सबसे बड़ी उपलब्धि 1510 ईस्वी में गोवा पर विजय थी। उस समय गोवा बीजापुर सल्तनत के अधीन था। अल्बुकर्क ने अपनी नौसैनिक शक्ति और सैन्य रणनीति के बल पर गोवा पर अधिकार कर लिया। गोवा का भौगोलिक स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहाँ से अरब सागर के व्यापार पर आसानी से नियंत्रण रखा जा सकता था। इसी कारण गोवा को भारत में पुर्तगालियों की राजधानी बनाया गया। गोवा को पुर्तगालियों ने राजधानी क्यों बनाया? जानिए इसके प्रमुख कारण गोवा को राजधानी बनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे
  • यह एक प्राकृतिक और सुरक्षित बंदरगाह था।
  • अरब सागर के व्यापार पर नियंत्रण रखना आसान था।
  • पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्रों से इसका संपर्क अच्छा था।
  • यहाँ से सैन्य गतिविधियों का संचालन सुविधाजनक था।
  • विदेशी व्यापार को नियंत्रित करने के लिए यह उपयुक्त स्थान था।
इन्हीं कारणों से गोवा लंबे समय तक पुर्तगाली सत्ता का प्रमुख केंद्र बना रहा।
कार्टाज प्रणाली : पुर्तगालियों की समुद्री व्यापार नियंत्रण व्यवस्था का इतिहास भारत में पुर्तगालियों द्वारा लागू की गई सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक व्यवस्था कार्टाज प्रणाली थी। कार्टाज एक प्रकार का समुद्री व्यापारिक लाइसेंस था। पुर्तगालियों ने आदेश दिया कि हिंद महासागर में व्यापार करने वाले प्रत्येक जहाज को उनसे कार्टाज लेना होगा। बिना कार्टाज के कोई भी जहाज समुद्र में व्यापार नहीं कर सकता था। यदि कोई जहाज बिना अनुमति के पकड़ा जाता था, तो
  • उसका माल जब्त कर लिया जाता था।
  • जहाज को नष्ट कर दिया जाता था।
  • व्यापारियों को दंडित किया जाता था।
इस व्यवस्था के माध्यम से पुर्तगालियों ने समुद्री व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। भारत में पुर्तगालियों के प्रमुख व्यापारिक केंद्र: कालीकट से गोवा तक व्यापार का विस्तार
भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पुर्तगालियों ने कई महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। इनमें प्रमुख थे
पुर्तगालियों का भारत आगमन: वास्को-दा-गामा से गोवा तक का सम्पूर्ण इतिहास

इन केंद्रों के माध्यम से पुर्तगालियों ने भारत और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का विस्तृत नेटवर्क तैयार किया। भारत में पुर्तगालियों का धार्मिक प्रभाव: ईसाई धर्म के प्रसार और मिशनरियों की भूमिका का इतिहास पुर्तगाली केवल व्यापारी नहीं थे, बल्कि वे ईसाई धर्म के प्रचारक भी थे। उन्होंने भारत के पश्चिमी तट, विशेषकर गोवा में अनेक चर्चों, विद्यालयों और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने स्थानीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। कुछ स्थानों पर धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से हुआ, जबकि कुछ मामलों में कठोर नीतियों की भी आलोचना की गई। गोवा में आज भी अनेक प्राचीन चर्च, गिरजाघर और यूरोपीय शैली की इमारतें पुर्तगालियों की विरासत की याद दिलाती हैं। भारतीय समाज और संस्कृति पर पुर्तगालियों का प्रभाव: भाषा, धर्म और जीवन शैली में बदलाव पुर्तगालियों का प्रभाव केवल व्यापार और राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति, भोजन और कृषि पर भी गहरा प्रभाव डाला।
पुर्तगालियों का भारत आगमन: वास्को-दा-गामा से गोवा तक का सम्पूर्ण इतिहास
    आज भारतीय रसोई में लाल मिर्च का विशेष महत्व है, लेकिन यह भारत की मूल फसल नहीं थी। इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी पुर्तगालियों को दिया जाता है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने जहाज निर्माण, समुद्री मानचित्रण और पश्चिमी स्थापत्य कला का भी प्रभाव भारतीय तटीय क्षेत्रों में छोड़ा।

पुर्तगालियों की प्रमुख उपलब्धियाँ भारत में पुर्तगालियों का शासन केवल व्यापार तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई ऐसे कार्य किए जिनका प्रभाव भारतीय इतिहास पर लंबे समय तक दिखाई दिया। यद्यपि उनका उद्देश्य अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना था, फिर भी उनके आगमन से भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और समुद्री इतिहास में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं 1. भारत और यूरोप के बीच सीधा समुद्री मार्ग स्थापित करना पुर्तगालियों की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत और यूरोप के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित करना थी। इससे दोनों महाद्वीपों के बीच व्यापार तेज़ी से बढ़ा और नई व्यापारिक संभावनाएँ खुलीं। 2. भारत में पहली यूरोपीय बस्तियों की स्थापना पुर्तगाली भारत में स्थायी रूप से बसने वाले पहले यूरोपीय थे। उन्होंने गोवा, दमन, दीव, कोचीन और कन्नूर जैसे स्थानों पर व्यापारिक एवं प्रशासनिक केंद्र स्थापित किए। 3. समुद्री शक्ति का विकास पुर्तगालियों ने शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया और हिंद महासागर में लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा। उनकी नौसैनिक तकनीक उस समय की अन्य शक्तियों की तुलना में अधिक उन्नत थी। 4. स्थापत्य कला का विकास गोवा सहित कई क्षेत्रों में पुर्तगालियों ने चर्च, किले और यूरोपीय शैली की इमारतों का निर्माण कराया। आज भी गोवा की वास्तुकला में पुर्तगाली प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
भारत पर पुर्तगालियों का प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव ,समुद्री व्यापार का विस्तार

पुर्तगालियों ने भारत को सीधे यूरोप के बाजारों से जोड़ा। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नई संभावनाएँ पैदा हुईं। नई कृषि फसलों का प्रसार मिर्च, आलू और टमाटर जैसी फसलों ने भारतीय कृषि और भोजन को समृद्ध बनाया।
जहाज निर्माण और नौवहन तकनीक का विकास समुद्री यात्रा, जहाज निर्माण और नौवहन के क्षेत्र में नई तकनीकों का परिचय हुआ। सांस्कृतिक आदान-प्रदान भारत और यूरोप के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान: कला, भाषा, भोजन और स्थापत्य में नए प्रभाव पुर्तगालियों के भारत आगमन के बाद केवल व्यापार और राजनीति में ही बदलाव नहीं आया, बल्कि भारत और यूरोप के बीच सांस्कृतिक संबंध भी मजबूत हुए। इस संपर्क के कारण कला, भाषा, खान-पान और स्थापत्य कला के क्षेत्र में दोनों सभ्यताओं ने एक-दूसरे से कई चीजें ग्रहण कीं। पुर्तगाली प्रभाव के कारण भारत में कुछ नए खाद्य पदार्थ, वास्तुकला की नई शैलियाँ और विदेशी भाषाओं के शब्दों का प्रवेश हुआ। वहीं भारतीय मसालों, कला और परंपराओं ने भी यूरोपीय समाज को प्रभावित किया। इस प्रकार पुर्तगालियों का आगमन भारत और यूरोप के बीच सांस्कृतिक मेल-जोल का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना नकारात्मक प्रभाव हालाँकि पुर्तगालियों ने कुछ सकारात्मक परिवर्तन किए, लेकिन उनके शासन के कई नकारात्मक पहलू भी थे। व्यापार पर एकाधिकार उन्होंने समुद्री व्यापार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया और अन्य व्यापारियों को व्यापार करने से रोका। धार्मिक असहिष्णुता कुछ क्षेत्रों में धर्म परिवर्तन के लिए कठोर नीतियाँ अपनाई गईं, जिससे स्थानीय लोगों में असंतोष फैला।
भारतीय शासकों से संघर्ष व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए उन्होंने कई भारतीय राज्यों के साथ युद्ध किए। उपनिवेशवाद की शुरुआत पुर्तगालियों के आगमन ने भारत में यूरोपीय उपनिवेशवाद की नींव रखी। बाद में डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी भी भारत आए। भारत में पुर्तगालियों के पतन के कारण: कमजोर होती शक्ति और ब्रिटिश प्रभुत्व का इतिहास 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली शक्ति अपने चरम पर थी, लेकिन 17वीं शताब्दी में उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। इसके पीछे कई कारण थे 1. डच और अंग्रेज़ों का आगमन डच और अंग्रेज़ व्यापार के साथ-साथ आधुनिक नौसैनिक शक्ति लेकर आए। उनकी आर्थिक और सैन्य क्षमता पुर्तगालियों से अधिक थी। 2. भ्रष्ट प्रशासन भारत में कई पुर्तगाली अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए। इससे प्रशासन कमजोर होने लगा। 3. सीमित संसाधन पुर्तगाल की सीमित आर्थिक और सैन्य क्षमता पुर्तगाल एक छोटा यूरोपीय देश था, जिसके पास एक विशाल समुद्री साम्राज्य को लंबे समय तक संभालने के लिए पर्याप्त धन, सैनिक और संसाधन उपलब्ध नहीं थे। शुरुआत में पुर्तगालियों ने भारत के तटीय क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, लेकिन समय के साथ इतने बड़े क्षेत्र की सुरक्षा और प्रशासन करना उनके लिए कठिन होता गया। कम संसाधनों के कारण वे अपने व्यापारिक केंद्रों और सैन्य ठिकानों को मजबूत नहीं रख सके। यही कमजोरी आगे चलकर भारत में पुर्तगाली शक्ति के पतन का एक प्रमुख कारण बनी
4. भारतीय शासकों का विरोध बीजापुर, मुगल साम्राज्य और मराठों सहित कई भारतीय शक्तियों ने पुर्तगालियों का विरोध किया। 5. धार्मिक कठोरता कुछ स्थानों पर धार्मिक नीतियों ने स्थानीय जनता को पुर्तगालियों के विरुद्ध कर दिया। 6. समुद्री प्रतिस्पर्धा डच और अंग्रेज़ों की आधुनिक नौसेना के सामने पुर्तगालियों का प्रभुत्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया। भारत में पुर्तगालियों का अंत: पुर्तगाली साम्राज्य के पतन और अंतिम दौर का इतिहास
17वीं शताब्दी के बाद पुर्तगालियों की अधिकांश व्यापारिक चौकियाँ डच और अंग्रेज़ों के हाथों चली गईं। हालाँकि गोवा, दमन और दीव पर उनका अधिकार लंबे समय तक बना रहा। भारत की स्वतंत्रता के बाद भी ये क्षेत्र पुर्तगाल के अधीन रहे। अंततः 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाकर गोवा, दमन और दीव को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया। इसके साथ ही भारत में लगभग 451 वर्षों से चला आ रहा पुर्तगाली शासन समाप्त हो गया। पुर्तगालियों का भारत आगमन केवल एक समुद्री यात्रा नहीं था, बल्कि यह भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना थी जिसने व्यापार, राजनीति और संस्कृति की दिशा बदल दी। 1498 ईस्वी में वास्को-दा-गामा के कालीकट पहुँचने से भारत और यूरोप के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित हुआ। इसके बाद भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर उपनिवेशवाद और ब्रिटिश शासन की नींव रखी

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