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लोह स्तंभ महरौली का इतिहास | 1600 साल से बिना जंग लगा भारत का अद्भुत लौह स्तंभ


लोह स्तंभ महरौली का इतिहास | 1600 साल से बिना जंग लगा भारत का अद्भुत लौह स्तंभ

दिल्ली घूमने आने वाले अधिकांश लोग सबसे पहले कुतुब मीनार देखने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसी परिसर में एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर भी खड़ी है जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह धरोहर है महरौली का लोह स्तंभ। पहली नज़र में यह सिर्फ लोहे का एक साधारण स्तंभ दिखाई देता है, लेकिन जैसे-जैसे आप इसके बारे में जानना शुरू करते हैं, आपको एहसास होता है कि यह केवल एक स्तंभ नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक प्रतिभा और अद्भुत धातुकला का जीवंत प्रमाण है। ज़रा सोचिए, आज भी जब लोहे की रेलिंग, गेट या पुल कुछ ही वर्षों में जंग खाने लगते हैं, तब लगभग 1600 वर्ष पुराना यह लोह स्तंभ खुले आसमान के नीचे खड़ा है और आज भी लगभग बिना जंग के सुरक्षित है। यही कारण है कि इसे देखने आने वाला हर व्यक्ति एक बार जरूर सोचता है आख़िर ऐसा कैसे संभव हुआ ? यही सवाल वर्षों से वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को भी आकर्षित करता रहा है। कई देशों के विशेषज्ञों ने इस स्तंभ का अध्ययन किया, लेकिन इसकी निर्माण तकनीक आज भी भारतीय धातुकर्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।
 लोह स्तंभ कहाँ स्थित है? जानिए भारत की इस अद्भुत ऐतिहासिक धरोहर का स्थान दिल्ली के दक्षिणी भाग में स्थित महरौली क्षेत्र का नाम सुनते ही सबसे पहले कुतुब मीनार का ख्याल आता है। लेकिन इसी ऐतिहासिक परिसर में एक और धरोहर है, जो अपनी सादगी में भी असाधारण है लोह स्तंभ। यह स्तंभ कुतुब परिसर के भीतर स्थित है। हर दिन हजारों पर्यटक इसके पास से गुजरते हैं। कुछ लोग इसे सिर्फ देखकर आगे बढ़ जाते हैं, जबकि जो इसके इतिहास को जानते हैं, वे कुछ देर रुककर इसकी कहानी को महसूस करने की कोशिश करते हैं। एक समय ऐसा भी था जब लोग मानते थे कि यदि कोई व्यक्ति इस स्तंभ को पीछे से दोनों हाथों से घेर ले, तो उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है। हालांकि स्मारक की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अब इसके चारों ओर रेलिंग लगा दी गई है और इसे छूना प्रतिबंधित है।
लोह स्तंभ का इतिहास: जानिए भारत की प्राचीन धातुकला और वैज्ञानिक उपलब्धि की अद्भुत कहानी इतिहास की किताबें बताती हैं कि इस स्तंभ का निर्माण गुप्त साम्राज्य के समय हुआ था। अधिकांश इतिहासकार इसे सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य से जोड़ते हैं, जिनका शासन भारतीय इतिहास के सबसे समृद्ध कालों में गिना जाता है। उस समय भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि शिक्षा, गणित, खगोल विज्ञान, कला और धातुकर्म जैसे क्षेत्रों में भी दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल था। लोह स्तंभ उसी गौरवशाली युग की एक अमूल्य निशानी है। स्तंभ पर संस्कृत भाषा में ब्राह्मी लिपि का अभिलेख अंकित है, जिसमें "चंद्र" नामक राजा की वीरता और भगवान विष्णु के प्रति उनकी श्रद्धा का वर्णन मिलता है। इसी आधार पर इतिहासकार मानते हैं कि इसका संबंध चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य से है। कई विद्वानों का यह भी मत है कि यह स्तंभ पहले मध्य प्रदेश के उदयगिरि में स्थापित था और बाद में दिल्ली लाया गया। यद्यपि इस विषय पर मतभेद हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह स्तंभ भारत की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है।

लोह स्तंभ का निर्माण किसने कराया था? जानिए इस प्राचीन धरोहर के निर्माता के बारे में
जब भी लोह स्तंभ की बात होती है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर इतना अद्भुत स्तंभ बनवाया किसने था? इतिहासकारों की राय इस विषय पर लगभग एक जैसी है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि इसका निर्माण गुप्त वंश के महान शासक सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने चौथी शताब्दी ईस्वी के आसपास करवाया था। उस समय भारत ज्ञान, विज्ञान, कला और संस्कृति के क्षेत्र में लगातार नई ऊँचाइयाँ छू रहा था। चंद्रगुप्त द्वितीय केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं थे, बल्कि वे कला और विज्ञान के संरक्षक भी माने जाते हैं। उनके शासनकाल में अनेक मंदिर, स्मारक और स्थापत्य कृतियाँ बनाई गईं। लोह स्तंभ भी उसी स्वर्णिम युग की एक शानदार पहचान माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तंभ को भगवान विष्णु के सम्मान में बनवाया गया था। इसलिए कई इतिहासकार इसे विष्णुध्वज भी कहते हैं। यह केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं था, बल्कि राजा की विजय, शक्ति और समृद्ध शासन का भी संदेश देता था।
क्या लोह स्तंभ हमेशा से दिल्ली में था? जानिए इसके स्थान परिवर्तन का रोचक इतिहास
यह सवाल भी काफी रोचक है। कई शोधों के अनुसार लोह स्तंभ शुरू से दिल्ली में नहीं था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसे पहले मध्य प्रदेश के उदयगिरि में स्थापित किया गया था, जहाँ गुप्तकाल में भगवान विष्णु का एक महत्वपूर्ण मंदिर था। बाद में लगभग 11वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल तोमर इसे दिल्ली लेकर आए और महरौली में स्थापित किया। हालांकि इस विषय पर सभी इतिहासकार पूरी तरह एकमत नहीं हैं, लेकिन अधिकांश शोध इसी संभावना की ओर संकेत करते हैं। यही कारण है कि लोह स्तंभ का इतिहास केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत की सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा माना जाता है।
लोह स्तंभ महरौली का इतिहास | 1600 साल से बिना जंग लगा भारत का अद्भुत लौह स्तंभ

लोह स्तंभ की बनावट और आकार: जानिए इसकी अद्भुत संरचना और प्राचीन निर्माण कला के बारे में


अगर आप पहली बार इस स्तंभ को सामने से देखें, तो शायद आपको यह साधारण लगे। लेकिन जब इसकी वास्तविक बनावट और माप के बारे में पता चलता है, तब इसकी विशालता का अंदाज़ा होता है। इस स्तंभ की कुल ऊँचाई लगभग 7.21 मीटर है, जिसमें से लगभग 6.7 मीटर हिस्सा जमीन के ऊपर दिखाई देता है और बाकी भाग जमीन के भीतर मजबूती से गड़ा हुआ है। इसका वजन लगभग 6 टन बताया जाता है। सोचिए, लगभग सोलह सौ वर्ष पहले इतनी बड़ी लोहे की संरचना तैयार करना और उसे सुरक्षित रूप से स्थापित करना कितना कठिन काम रहा होगा। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि उस समय आज जैसी आधुनिक मशीनें, क्रेन या भारी निर्माण उपकरण मौजूद नहीं थे। फिर भी भारतीय कारीगरों ने अपनी बुद्धिमत्ता, अनुभव और तकनीकी कौशल के बल पर यह असंभव-सा कार्य संभव कर दिखाया।

इतने विशाल लोह स्तंभ का निर्माण कैसे हुआ होगा? जानिए प्राचीन भारत की अद्भुत धातुकला तकनीक

वैज्ञानिकों का मानना है कि लोह स्तंभ को किसी साँचे में ढालकर नहीं बनाया गया था। इसके बजाय गर्म किए गए लोहे के बड़े-बड़े टुकड़ों को बार-बार पीटकर और जोड़कर तैयार किया गया। इस प्रक्रिया को आज भी धातुकर्म की सबसे कठिन तकनीकों में गिना जाता है। यानी उस समय के भारतीय कारीगर केवल लोहे को पिघलाना ही नहीं जानते थे, बल्कि उसे इस तरह जोड़ना भी जानते थे कि पूरी संरचना एक मजबूत स्तंभ का रूप ले सके। यह उपलब्धि उस समय की भारतीय तकनीकी समझ का शानदार उदाहरण है।
लोह स्तंभ की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? जानिए इसके जंग रहित रहने का अद्भुत रहस्य

यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि लोह स्तंभ आखिर इतना प्रसिद्ध क्यों है, तो उसका सबसे सरल उत्तर होगा इस पर लगभग जंग नहीं लगी। सोचिए, आज घर के बाहर लगी लोहे की ग्रिल, गेट या रेलिंग कुछ ही वर्षों में जंग खाने लगती है। बारिश, धूप और नमी का असर लोहे पर साफ दिखाई देता है। लेकिन महरौली का यह स्तंभ लगभग 1600 वर्षों से खुले आसमान के नीचे खड़ा है, फिर भी इसकी सतह पर सामान्य लोहे जैसी जंग दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि इसे दुनिया के सबसे रहस्यमय धातु स्मारकों में गिना जाता है। कई वर्षों तक लोगों ने इसे चमत्कार माना, लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने इसके पीछे छिपे कारणों को समझने का प्रयास किया।
आख़िर लोह स्तंभ पर जंग क्यों नहीं लगती? जानिए 1600 साल पुराने इस वैज्ञानिक रहस्य का कारण

यह प्रश्न शायद हर उस व्यक्ति के मन में आता है, जो पहली बार इस स्तंभ के बारे में पढ़ता है। दिलचस्प बात यह है कि इसका उत्तर किसी जादू में नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन धातुकर्म तकनीक में छिपा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्तंभ में इस्तेमाल किए गए लोहे की गुणवत्ता सामान्य लोहे से अलग है। इसमें फॉस्फोरस की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि सल्फर और मैंगनीज जैसी अशुद्धियाँ बहुत कम हैं। समय के साथ इसकी सतह पर एक बेहद पतली और मजबूत सुरक्षात्मक परत बन गई। यह परत नमी और हवा को सीधे लोहे तक पहुँचने से रोकती है। इसी कारण जंग बनने की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाती है। यही वजह है कि सदियों बीत जाने के बाद भी यह स्तंभ आज इतनी अच्छी अवस्था में दिखाई देता है। हालाँकि वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि दिल्ली की जलवायु और वातावरण ने भी इस स्तंभ को सुरक्षित रखने में कुछ हद तक योगदान दिया है।


लोह स्तंभ की स्थापत्य कला: जानिए सादगी में छिपी प्राचीन भारत की अद्भुत इंजीनियरिंग कला

पहली नज़र में लोह स्तंभ जितना साधारण दिखाई देता है, उसकी बनावट उतनी ही असाधारण है। इसमें कहीं भी ज़रूरत से ज़्यादा सजावट या जटिल नक्काशी नहीं दिखाई देती, फिर भी इसकी सुंदरता लोगों को अपनी ओर खींच लेती है। स्तंभ का निचला भाग अपेक्षाकृत मोटा है, जबकि ऊपर की ओर यह धीरे-धीरे पतला होता जाता है। इस तरह का संतुलित डिज़ाइन केवल देखने में ही आकर्षक नहीं है, बल्कि यह स्तंभ को मजबूती भी प्रदान करता है। माना जाता है कि इसी संतुलित संरचना के कारण यह सदियों तक मौसम की मार झेलने के बाद भी सुरक्षित खड़ा है। स्तंभ के ऊपरी भाग में कभी भगवान विष्णु से संबंधित प्रतीक या ध्वज स्थापित होने के संकेत भी मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इसका उद्देश्य केवल स्मारक बनाना नहीं था, बल्कि यह धार्मिक आस्था और राजकीय गौरव दोनों का प्रतीक था। लोह स्तंभ पर अंकित अभिलेख क्या बताते हैं? जानिए इस प्राचीन शिलालेख में छिपे इतिहास के रहस्य
लोह स्तंभ पर संस्कृत भाषा में ब्राह्मी लिपि का एक महत्वपूर्ण अभिलेख अंकित है। इतिहासकारों के लिए यही अभिलेख इस स्तंभ के इतिहास को समझने का सबसे बड़ा आधार है। इस अभिलेख में एक महान राजा "चंद्र" की वीरता, युद्ध कौशल और भगवान विष्णु के प्रति उनकी भक्ति का उल्लेख मिलता है। अधिकांश विद्वान इस "चंद्र" को सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य मानते हैं। अभिलेख से यह भी पता चलता है कि उस समय भारत में संस्कृत भाषा का व्यापक उपयोग होता था और राजाओं की उपलब्धियों को शिलालेखों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाता था। यही कारण है कि लोह स्तंभ केवल धातुकला का उदाहरण नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण लिखित दस्तावेज़ भी है।

लोह स्तंभ पर वैज्ञानिकों ने क्या शोध किए? जानिए इस प्राचीन धरोहर के वैज्ञानिक रहस्यों की खोज

जब विदेशी वैज्ञानिकों ने पहली बार इस स्तंभ का अध्ययन किया, तो उन्हें सबसे अधिक आश्चर्य इसकी धातु की गुणवत्ता को देखकर हुआ। सवाल यह था कि जिस लोहे पर सामान्य परिस्थितियों में कुछ वर्षों में जंग लग जाती है, वह लगभग 1600 वर्षों तक सुरक्षित कैसे रह सकता है? इस रहस्य को समझने के लिए कई बार धातु परीक्षण किए गए। शोध में पता चला कि यह स्तंभ साधारण लोहे से अलग तकनीक से बनाया गया था। इसमें फॉस्फोरस की मात्रा अधिक थी और अन्य अशुद्धियाँ बहुत कम थीं। इसके कारण समय के साथ इसकी सतह पर एक पतली सुरक्षात्मक परत बन गई, जिसने जंग लगने की प्रक्रिया को लगभग रोक दिया। आज भी दुनिया के कई विश्वविद्यालय और शोध संस्थान इस स्तंभ का उदाहरण देकर प्राचीन भारतीय धातुकर्म तकनीक की चर्चा करते हैं।
क्या लोह स्तंभ सचमुच दुनिया के लिए एक रहस्य है? जानिए इसके पीछे छिपे वैज्ञानिक और ऐतिहासिक रहस्य काफी हद तक इसका उत्तर हाँ है। हालाँकि वैज्ञानिक इसके पीछे के कई कारण समझ चुके हैं, लेकिन उस समय इतनी उन्नत तकनीक का उपयोग कैसे किया गया, यह आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। यह स्तंभ हमें यह याद दिलाता है कि भारत केवल आध्यात्मिक ज्ञान का ही नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक का भी अग्रणी केंद्र रहा है।
लोह स्तंभ से जुड़े कुछ रोचक तथ्य: जानिए भारत की इस प्राचीन धरोहर के अनोखे रहस्य इतिहास को रोचक बनाने वाली बातें अक्सर किताबों में नहीं मिलतीं, लेकिन लोह स्तंभ के बारे में कुछ ऐसे तथ्य हैं जिन्हें जानकर हर कोई हैरान रह जाता है।
  • यह स्तंभ लगभग 1600 वर्ष पुराना माना जाता है।
  • इसका वजन लगभग 6 टन है।
  • इसे आधुनिक वेल्डिंग मशीनों के बिना तैयार किया गया था।
  • सदियों तक लोग इसे शुभ मानकर गले लगाने की कोशिश करते थे।
  • इसकी निर्माण तकनीक आज भी इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का विषय है।
  • यह भारत की प्राचीन धातुकर्म कला का विश्व प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है।

लोह स्तंभ महरौली का इतिहास | 1600 साल से बिना जंग लगा भारत का अद्भुत लौह स्तंभ



क्या लोह स्तंभ से कोई मान्यता भी जुड़ी है? जानिए इस ऐतिहासिक धरोहर से जुड़ी लोक मान्यताएँ और विश्वास

कहा जाता था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पीठ स्तंभ से लगाकर दोनों हाथों को पीछे की ओर ले जाकर उसे पूरा घेर ले, तो उसकी मनोकामना पूरी हो जाती है। इसी विश्वास के कारण हजारों लोग ऐसा करने की कोशिश करते थे। लेकिन लगातार छूने से स्मारक को नुकसान पहुँचने लगा। इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी सुरक्षा के लिए चारों ओर लोहे की रेलिंग लगा दी। आज पर्यटक इसे केवल दूर से ही देख सकते हैं।
क्या लोह स्तंभ से कोई मान्यता भी जुड़ी है? जानिए इस ऐतिहासिक धरोहर से जुड़ी लोक मान्यताएँ और विश्वास
यदि गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है, तो लोह स्तंभ उस स्वर्ण युग की सबसे मजबूत पहचान है। यह हमें बताता है कि उस समय भारत में केवल साहित्य, गणित और खगोल विज्ञान ही विकसित नहीं थे, बल्कि धातु विज्ञान भी अपने उच्च स्तर पर था। लोह स्तंभ यह साबित करता है कि हमारे पूर्वज प्रकृति, धातुओं और निर्माण तकनीक को गहराई से समझते थे। यही कारण है कि आज भी दुनिया इस स्तंभ को सम्मान की दृष्टि से देखती है।

पर्यटकों के लिए लोह स्तंभ क्यों खास है? जानिए इस ऐतिहासिक धरोहर की लोकप्रियता और आकर्षण के कारण

अगर आप दिल्ली घूमने की योजना बना रहे हैं, तो कुतुब मीनार के साथ लोह स्तंभ को देखना बिल्कुल न भूलें। जब आप इसके सामने खड़े होते हैं, तो यह महसूस होता है कि यह केवल लोहे का एक खंभा नहीं, बल्कि सदियों से भारतीय इतिहास की कहानी अपने भीतर समेटे खड़ा एक मौन साक्षी है। शायद यही कारण है कि हर साल लाखों पर्यटक इसकी तस्वीरें लेते हैं, इसके इतिहास को जानने की कोशिश करते हैं और भारत की प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व महसूस करते हैं।


लोह स्तंभ देखने का सबसे अच्छा समय: जानिए यात्रा के लिए कौन सा मौसम रहेगा सबसे बेहतर
अगर आप लोह स्तंभ को करीब से देखने और इसके इतिहास को महसूस करने का अनुभव लेना चाहते हैं, तो अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे अच्छा माना जाता है। इस दौरान दिल्ली का मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है और कुतुब परिसर में घूमने का आनंद भी दोगुना हो जाता है। गर्मियों में दिल्ली का तापमान काफी अधिक हो जाता है, इसलिए यदि आप अप्रैल से जून के बीच यहाँ आने की योजना बना रहे हैं, तो सुबह या शाम के समय पहुँचना बेहतर रहेगा।

लोह स्तंभ तक कैसे पहुँचें? जानिए दिल्ली की इस ऐतिहासिक धरोहर तक जाने का आसान रास्ता

दिल्ली देश के लगभग हर बड़े शहर से सड़क, रेल और हवाई मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ी हुई है। इसलिए यहाँ पहुँचना बेहद आसान है। मेट्रो द्वारा यदि आप दिल्ली मेट्रो से यात्रा कर रहे हैं, तो कुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन सबसे नज़दीकी स्टेशन है। वहाँ से ऑटो या ई-रिक्शा द्वारा कुछ ही मिनटों में कुतुब परिसर पहुँचा जा सकता है। बस द्वारा दिल्ली परिवहन निगम (DTC) की कई बसें महरौली क्षेत्र तक जाती हैं। बस से यात्रा करने वाले पर्यटकों के लिए भी यह स्थान आसानी से पहुँचा जा सकता है। टैक्सी या कैब द्वारा यदि आप परिवार या दोस्तों के साथ घूमने जा रहे हैं, तो टैक्सी या ऑनलाइन कैब सेवा सबसे सुविधाजनक विकल्प है।

लोह स्तंभ हमें क्या सिखाता है? जानिए भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच और ज्ञान की प्रेरणादायक कहानी
इतिहास केवल बीते हुए समय की कहानियाँ नहीं होता, बल्कि वह हमें यह भी बताता है कि हमारे पूर्वज कितने दूरदर्शी और कुशल थे। लोह स्तंभ हमें सिखाता है कि जब दुनिया के कई हिस्सों में धातु विज्ञान शुरुआती दौर में था, तब भारत के कारीगर ऐसी तकनीक विकसित कर चुके थे, जिसकी प्रशंसा आज भी वैज्ञानिक करते हैं। यह स्तंभ हमें अपनी विरासत पर गर्व करना सिखाता है। साथ ही यह प्रेरणा भी देता है कि ज्ञान, विज्ञान और मेहनत से ऐसी उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं, जो सदियों तक लोगों को प्रेरित करती रहें।
आज के समय में लोह स्तंभ का महत्व: जानिए भारत की प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों और ऐतिहासिक विरासत की पहचान आज लोह स्तंभ केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास, विज्ञान और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है। देश-विदेश के शोधकर्ता यहाँ आकर इसकी धातु संरचना का अध्ययन करते हैं। इतिहास के विद्यार्थी इसे गुप्तकालीन भारत की उपलब्धियों के उदाहरण के रूप में पढ़ते हैं, जबकि पर्यटक इसे देखकर भारत की प्राचीन इंजीनियरिंग क्षमता की सराहना करते हैं।
यही कारण है कि लोह स्तंभ को भारत की सबसे अनमोल ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है। दिल्ली के महरौली में स्थित लोह स्तंभ केवल लोहे का एक खंभा नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच, धातुकर्म कला और इंजीनियरिंग कौशल का जीवंत प्रमाण है। लगभग 1600 वर्षों से बिना जंग के खड़ा यह स्तंभ आज भी दुनिया को यह संदेश देता है कि प्राचीन भारत केवल संस्कृति और आध्यात्म का केंद्र ही नहीं था, बल्कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी अत्यंत विकसित था |

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